ऋतु शरद

 

ऋतु शरद

ऋतु शरद 



जौबन की रंग में राजे

कांस की ओढ़नी ओढ़े 

समय की गाड़ी पर बैठी 

धूप के जोड़े में लिपटी

रंग-बिरंगे जेवर लादे 

लौट आई ऋतु शरद की।


प्रकृति के हर कोने में 

सिंगार की वास उडेलकर

मधुमालती बूटों को छेड़कर 

चौपाल में हँसी-ठट्ठा कर 

आई पुरवाई ऋतु शरद की।


बारिश को करके विदा 

स्वच्छ नीलाकाश करकर 

लहलहाती धान खेतों पर 

ज्वार की कलगियों उपर

गोरैया जैसी चहचहा कर

लौट आई ऋतु शरद की।


सरोवर में कमल खेलती 

दिवस सुहावने बनाकर 

निशा में सिहरन भरती 

कुमुदिनी की पंखुरियों पर 

चाँदी सी झिलमिला कर 

आई ऋतु शरद की। 


कोजागिरी की रश्मियों से 

धन-धान्य अमृत बनाकर 

दूब पहनती है हीरकनियाँ 

दिनभर देहरिपे दस्तक देती 

दीपक सी उज्वलमयी

सुंदरता ऋतु शरद की। 


तन - मन किनारे जोड़ती 

अनुराग की पातियाँ बनाकर 

रास लोकपर्व गीतों में छाई 

चहकी महकी बहकी खनकी 

नेह से सरसाई ऐसे आई

फिर ऋतु शरद की। 

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